Tuesday, May 13, 2008

रामू को एकता सेक्सी लगती हैं

छोटे परदे की महारानी एकता कपूर दो कारणों से सुर्खियों में हैं। कुछ केंद्रीय मंत्री उनके सीरियलों को प्रतिबंधित करना चाहते हैं, क्योंकि गलत जीवन मूल्यों की प्रस्तुति उनमें की जा रही है। दूसरा कारण यह है कि राम गोपाल वर्मा ने बयान दिया है कि उन्हें एकता कपूर बहुत सेक्सी लगती हैं। केंद्रीय मंत्रियों को चाहिए कि वे अपना ध्यान राष्ट्रीय समस्याओं पर लगाएं। क्या दिखाना चाहिए और क्या नहीं यह मामला अवाम खुद तय कर लेगा। आप कृपया करके मनोरंजन को परिभाषित नहीं करते हुए स्वतंत्रता और कानून की ही व्याख्या और व्यवस्था करें। इन पंक्तियों का यह अर्थ नहीं है कि एकता के सीरियल मुझे पसंद हैं। पसंद या नापसंद का सवाल उठता है जब उन्हें देखा गया हो।
मुद्दा फिर वही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम निहित स्वार्थो द्वारा आयोजित हुल्लड़बाजी है। निदा फाजली ने कमाल अमरोही की साथ बिताए वक्त के आधार पर कुछ लिखा है और मरहूम अमरोही साहब की बेटी ने उन्हें कानूनी नोटिस भेज दिया है कि माफी मांगें। गोया कि आज के दौर में लेखक माफी ही मांगते रहें कि मुझे अपनी विचार करने की शक्ति पर खेद है। अगर अवाम उन सीरियलों को चटखारे लेकर हजम कर रहा है तो सरकारी डॉक्टर उसके बदहाजमे का इलाज क्यों करना चाहते हैं।
हुक्मरानों आप अवाम को रोटी, कपड़ा, और मकान दें, वह अपना मनोरंजन स्वयं चुन लेगा। राम गोपाल वर्मा की ‘सरकार राज’ के विश्व वितरण अधिकार एकता कपूर ने विगत की तरह खरीद लिए थे और हाल ही में उन्हें कुविख्यात हाथी दांत चोर वीरप्पन पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव दिया है। ज्ञातव्य है कि शमित अमीन (चक दे इंडिया) ने रामू के लिए ‘अब तक छप्पन’ बनाने के बाद वीरप्पन पर पटकथा लिखी थी जिसका नाम था ‘लैट्स कैच वीरप्पन’। यह अजीब बात है कि मणिरत्नम ने भी रावण की छवि में वीरप्पन का चरित्र ढाला है और उनकी पटकथा भी तैयार है। साथ ही बोनी कपूर की सलमान अभिनीत ‘वांटेड’ के एक्शन मास्टर विजय ने भी वीरप्पन पर पटकथा लिखी है और सलमान को पसंद है। वीरप्पन में फिल्मकारों की रुचि का सीधा कारण यह है कि अपराध कथाएं सफल होती हैं। इस देश में गब्बर, वीरू से ज्यादा लोकप्रिय रहा है।
राम गोपाल वर्मा रूमानी आदमी हैं और यह बताना कठिन है कि उन्हें फिल्में ज्यादा पसंद हैं या औरतें। वे प्राय: अपनी नायिकाओं में रुचि लेते रहे हैं। उर्मिला मातोंडकर दशकों उनकी प्रिय रही हैं परंतु निशा कोठारी या अंतरा माली को वे सफल नायिका नहीं बना पाए। वरन इसी प्रयास में उन्होंने दर्जनों डब्बे बनाए और कंपनी का बेड़ा गर्क हो गया। अत: उनका यह कहना कि एकता कपूर सेक्सी है, बहुत गहरे अर्थ रखता है।
एकता कपूर अब शायद 32 पार हैं और अभी तक कुंआरी हैं। दरअसल एकता का पूरा ध्यान केवल अपने काम पर है और प्रतिदिन 18 घंटे काम करने वाली एकता के पास इश्क के लिए समय ही नहीं है। वह सारा समय अपने दर्जन भर सीरियल की नायिकाओं को ही संवारती रहती हैं। क्या जीतेंद्र रामू जैसा दामाद पसंद करेंगे? क्या तुषार को रामू जैसा जीजा पसंद आएगा? एकता कपूर अपने से अधिक कामयाब आदमी से शादी करेंगी। पहले तो रामगोपाल वर्मा को सफल फिल्में बनानी होंगी तब जाकर वो एकता के समान स्तर पर बात कर पाएंगे। परंतु अभी दोनों साथ-साथ बैठकर डिनर कर सकते हैं।

Sunday, May 11, 2008

हिंदुस्तान

माँ संवेदना है भावना है अहसास है
माँ जीवन के फूलों मे खुशबू का वास है

सितारा माओं का सीक्रेट अजेंडा

माताओं के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर मदर टेरेसा या उन तमाम माताओं पर लिखना चाहिए जो अपने खून-पसीने से बच्चों को पालती हैं और उन माताओं को सलाम करना चाहिए जो दूसरों के बच्चों पर प्यार निछावर करती हैं, क्योंकि यही ममता की उच्चतर परिभाषा है, परंतु फिल्म के कॉलम में सितारा माताओं की बात करें जिनका समाज और फिल्म उद्योग में आदर, उनके बच्चों की बॉक्स ऑफिस कामयाबी पर निर्भर करता है। आज की चर्चित मां हैं नीतू ऋषि कपूर, क्योंकि उनका बेटा रणवीर पहली फिल्म ‘सावरिया’ की असफलता के बावजूद भव्य सितारा है। नीतू सिंह ने स्वयं सफल पारी खेली है। नियमित योग और सख्त अनुशासन से नीतू सिंह ने स्वयं को सुडौल और सुंदर बनाए रखा है। आए दिन टेलीविजन और फिल्म उद्योग से उन्हें प्रस्ताव मिलते हैं, जिन्हें वेअस्वीकार कर देती हैं। नीतू सिंह ने अपने पुत्र रणवीर और पुत्री रिद्घमा को अच्छे संस्कार दिए हैं।
कपूर खानदान की बबीता सफल सितारा रहीं, परंतु अच्छी अभिनेत्री नहीं रहीं। रणधीर कपूर से उनकी प्रेम कहानी और दाम्पत्य जीवन हमेशा बाढ़ वाली नदी की तरह रहा है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत कारणों से अपनी दोनों बेटियों को शिशु अवस्था से ही सितारा बनाने की बात घुट्टी में डालकर पिलाई है और इस लक्ष्य को पाने के लिए वे बहुत ही केंद्रित रही हैं। उन्होंने बेटियों को सिर पर लटकती तलवार की तरह नही वरन् स्वयं के सम्मान को बढ़ाने वाले हथियार की तरह पाला है। यही कारण है कि दोनों पुत्रियों ने हर पुरस्कार को ग्रहण करते हुए केवल अपनी मां को धन्यवाद दिया है गोयाकि कपूर कन्या होने का उन्हें लाभ ही नहीं मिला हो। क्या ये तीनों सफल महिलाएं वंश के प्रभाव या डीएनए की हकीकत से इनकार कर रही हैं। रणधीर ने हमेशा बेटियों को दिल से चाहा है और संकट के समय मदद भी की है। अभिषेक प्रकरण के बाद पिता और महान दादी बहुत काम आए हैं। बहरहाल बबीता ने अपना लक्ष्य पा लिया है, परंतु क्या सफर सुहाना रहा और आज वे शांत या संतुष्ट हैं? क्या करीना उनके नियंत्रण में उतनी ही हैं, जितनी करिश्मा रही हैं। वे एक एंग्री मदर रही हैं और मां के पारंपरिक दायरे में यह आता नहीं।
कॉजोल की मां तनूजा हमेशा बिंदास बेफिक्र औरत रही हैं और वे अपने जमाने से बहुत आगे रही हैं, परंतु उनकी मां शोभना समर्थ से ज्यादा साहसी और आधुनिक इस परिवार में कोई नहीं रहा है। कॉजोल अत्यंत प्रेमल होते हुए भी आधुनिका हैं। उनके साथ कोई पंगा नहीं ले सकता। कॉजोल अपनी मां तनूजा का श्रेष्ठतम परिचय हैं। अभिषेक की मां जया बच्चन ने परदे पर हजार चौरासी की मां का चरित्र निभाया है और मजे की बात है कि सारी भूमिकाओं को करने के बाद भी उन्होंने अपनी गुड्डी वाली छवि को कायम रखा है। उनकी बेटी श्वेता उनकी कमजोरी है और अभिषेक ताकत।
सितारा पुत्र ओर पुत्रियां हमेशा अपनी माताओं की बेटियां-बेटे अधिक रहे हैं बनिस्पत पिता के बेटे- बेटियों से, क्योंकि स्टारडम में आकंठ आलिप्त पिता हमेशा बहुत व्यस्त रहा है और बच्चों का लालन-पालन मां की जवाबदेही रहा है। माताएं अपने पतियों की तमाम आदतों और हरकतों से वाकिफ रही हैं। अत: लालन-पालन में उनका सीकेट्र एजेंडा भी रहा है। सारे सितारा बच्चों पर उनकी आयाओं का भी प्रभाव है, क्योंकि धनाढ्य घरों मे माताएं आया के बिना कुछ कर ही नहीं पातीं।

Friday, May 9, 2008

मिमोह की संभावनाओं को जिम्मी ने रोका
मिथुन चक्रवर्ती की की दूसरी परी का

एक नक्सली मोनार्क की कहानी

मिथुन चक्रवर्ती के सुपुत्र मिमोह ‘जिमी’ नामक फिल्म में प्रस्तुत हो रहे हैं। नेताओं, सितारों और डॉक्टरों के पुत्र प्राय: अपने पिता के व्यवसाय में जाते हैं। डॉक्टरों को पढ़ाई करनी होती है और पिता के व्यवसाय में होने से उन्हें परीक्षा में कोई खास रियायत नहीं मिलती।
नेता और सितारे अपनी औलादों को किसी तरह मैदान में ले ही आते हैं। आज मिमोह कल्पना नहीं कर सकते कि उनके पिता ने कितना संघर्ष किया है। उसके पास पारंपरिक हीरो का चॉकलेटी चेहरा नहीं था और रंग भी सांवला। उसका नक्सलवाद से भी संबंध रहा है।
मृणाल सेन ने उसे ‘मृगया’ में प्रस्तुत किया और जनजाति का पात्र उसे रास भी आया। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म के बाद ‘मुंबई के जंगल’ में उसे स्वीकार नहीं किया गया। वह भी जमा रहा और बी सुभाष की फिल्म ‘डिस्को डांसर’ ने उसे सितारा बना दिया। कस्तूरचंद बोकाडिया की फिल्म ‘प्यार झुकता नहीं’ ने उस एक्शन हीरो को पारिवारिक फिल्म का नायक बना दिया।
मिथुन ने तीन शिफ्टों में काम करके दर्जनों फिल्में पूरी कीं और इस धन से ऊटकमंड (ऊटी) में ‘मोनार्क’ नामक होटल बनाया। एक दौर ऐसा भी आया जब मिथुन की दर्जनों फिल्में असफल हो गईं और वह जलते हुए कोयले की तरह माना गया, जिसे कोई हाथ नहीं लगाना चाहता था।
डिस्को किंग बंगलौर चला गया। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में सितारे सभी को उपलब्ध नहीं थे। अत: दूसरी श्रेणी के सभी निर्माता मिथुन के पास गए जहां उसने ‘मोनार्क’ में डेरा डाला और ठेके पर फिल्में पूरी करने लगा। इन फिल्मों में अत्यंत कम बजट के कारण निर्माताओं को लाभ हुआ। दरअसल मोनार्क शैली का फिल्म निर्माण अपने लघु आर्थिक समीकरण के कारण सफल हुआ।
मिथुन ने तकनीशियनों को मासिक वेतन पर रखा और फिल्म दर फिल्म के अनुबंध से हटकर काम किया। यूनिट के सारे सदस्य सुबह नौ बजे से शाम सात बजे तक फैक्टरीनुमा अनुशासन की तरह काम करते थे।
मोनार्क शैली की लोकप्रियता के कारण मिथुन ने मद्रास के बड़े फिल्मकार की फिल्म नहीं की, क्योंकि उसे तीन माह मोनार्क से दूर रहना पड़ता। मिथुन को अमिताभ बच्चन के साथ ‘अग्निपथ’ में खूब सराहा गया। अपनी अधिकता के कारण मोनार्क शैली भी असफल हो गई। मिथुन मुंबई लौट आए।
मणिरत्नम की ‘गुरु’ में उन्हें खूब सराहा गया। नक्सलवाद से सितारा होने तक की यात्रा में पूंजीपति ‘मोनार्क’ का मालिक होना भी शामिल है और अब सामंतवादी परंपरा में अपने बेटे को सिंहासन पर आसीन करने का काम किया जा रहा है, क्या यह सच है कि उम्र के एक दौर में कम्यूनिज्म की ओर सहज झुकाव होता है परंतु सुविधा का जीवन मिलते ही मार्क्‍स की किताबों को ताक पर रखकर भुला दिया जाता है।

एक नक्सली मोनार्क की कहानी

मिथुन चक्रवर्ती के सुपुत्र मिमोह ‘जिमी’ नामक फिल्म में प्रस्तुत हो रहे हैं। नेताओं, सितारों और डॉक्टरों के पुत्र प्राय: अपने पिता के व्यवसाय में जाते हैं। डॉक्टरों को पढ़ाई करनी होती है और पिता के व्यवसाय में होने से उन्हें परीक्षा में कोई खास रियायत नहीं मिलती।
नेता और सितारे अपनी औलादों को किसी तरह मैदान में ले ही आते हैं। आज मिमोह कल्पना नहीं कर सकते कि उनके पिता ने कितना संघर्ष किया है। उसके पास पारंपरिक हीरो का चॉकलेटी चेहरा नहीं था और रंग भी सांवला। उसका नक्सलवाद से भी संबंध रहा है।
मृणाल सेन ने उसे ‘मृगया’ में प्रस्तुत किया और जनजाति का पात्र उसे रास भी आया। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म के बाद ‘मुंबई के जंगल’ में उसे स्वीकार नहीं किया गया। वह भी जमा रहा और बी सुभाष की फिल्म ‘डिस्को डांसर’ ने उसे सितारा बना दिया। कस्तूरचंद बोकाडिया की फिल्म ‘प्यार झुकता नहीं’ ने उस एक्शन हीरो को पारिवारिक फिल्म का नायक बना दिया।
मिथुन ने तीन शिफ्टों में काम करके दर्जनों फिल्में पूरी कीं और इस धन से ऊटकमंड (ऊटी) में ‘मोनार्क’ नामक होटल बनाया। एक दौर ऐसा भी आया जब मिथुन की दर्जनों फिल्में असफल हो गईं और वह जलते हुए कोयले की तरह माना गया, जिसे कोई हाथ नहीं लगाना चाहता था।
डिस्को किंग बंगलौर चला गया। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में सितारे सभी को उपलब्ध नहीं थे। अत: दूसरी श्रेणी के सभी निर्माता मिथुन के पास गए जहां उसने ‘मोनार्क’ में डेरा डाला और ठेके पर फिल्में पूरी करने लगा। इन फिल्मों में अत्यंत कम बजट के कारण निर्माताओं को लाभ हुआ। दरअसल मोनार्क शैली का फिल्म निर्माण अपने लघु आर्थिक समीकरण के कारण सफल हुआ।
मिथुन ने तकनीशियनों को मासिक वेतन पर रखा और फिल्म दर फिल्म के अनुबंध से हटकर काम किया। यूनिट के सारे सदस्य सुबह नौ बजे से शाम सात बजे तक फैक्टरीनुमा अनुशासन की तरह काम करते थे।
मोनार्क शैली की लोकप्रियता के कारण मिथुन ने मद्रास के बड़े फिल्मकार की फिल्म नहीं की, क्योंकि उसे तीन माह मोनार्क से दूर रहना पड़ता। मिथुन को अमिताभ बच्चन के साथ ‘अग्निपथ’ में खूब सराहा गया। अपनी अधिकता के कारण मोनार्क शैली भी असफल हो गई। मिथुन मुंबई लौट आए।
मणिरत्नम की ‘गुरु’ में उन्हें खूब सराहा गया। नक्सलवाद से सितारा होने तक की यात्रा में पूंजीपति ‘मोनार्क’ का मालिक होना भी शामिल है और अब सामंतवादी परंपरा में अपने बेटे को सिंहासन पर आसीन करने का काम किया जा रहा है, क्या यह सच है कि उम्र के एक दौर में कम्यूनिज्म की ओर सहज झुकाव होता है परंतु सुविधा का जीवन मिलते ही मार्क्‍स की किताबों को ताक पर रखकर भुला दिया जाता है।